<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-125616184089130577</id><updated>2011-11-28T04:45:58.263+05:30</updated><category term='मधु अरोड़ा'/><category term='कहानी'/><category term='तेजेन्द्र शर्मा'/><category term='साक्षात्कार'/><category term='राजीव रंजन प्रसाद'/><title type='text'>बिखरे मोती</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bikharemoti.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bikharemoti.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>साहित्य-शिल्पी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03337085754343699108</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BR8jbtvir7g/SMnNChdyKzI/AAAAAAAAALU/m4mx3lCCz5I/S220/logo.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>3</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-125616184089130577.post-593937183647037894</id><published>2009-02-18T06:39:00.001+05:30</published><updated>2009-02-18T06:39:49.808+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तेजेन्द्र शर्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मधु अरोड़ा'/><title type='text'>प्रसिद्व कथाकार तेजेन्द्रर शर्मा से बातचीत [साक्षात्कार] - मधु अरोड़ा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="apple-style-span"&gt;&lt;span style=" line-height:115%;Arial&amp;quot;,&amp;quot;sans-serif&amp;quot;;font-family:&amp;quot;;font-size:6.5pt;color:black;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="apple-style-span"&gt;&lt;span style="line-height:115%; Arial&amp;quot;,&amp;quot;sans-serif&amp;quot;;font-family:&amp;quot;;font-size:6.5pt;color:#666666;"&gt;&lt;img src="http://i447.photobucket.com/albums/qq194/sahityashilpi/poster/bachchan1.jpg" border="0" alt="Photobucket" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="apple-style-span"&gt;&lt;span style="line-height:115%; Arial&amp;quot;,&amp;quot;sans-serif&amp;quot;;font-family:&amp;quot;;font-size:6.5pt;color:black;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="apple-style-span"&gt;&lt;span style="line-height:115%; Arial&amp;quot;,&amp;quot;sans-serif&amp;quot;;font-family:&amp;quot;;font-size:6.5pt;color:#666666;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेखन आपके लिये क्या है?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102);"&gt;तेजेन्द्र शर्मा - &lt;/span&gt;&lt;/span&gt; लेखन मेरे लिए आवश्यकता भी है और मजबूरी भी। जब कभी ऐसा कुछ घटित होते देखता हूं जो मेरे मन को आंदोलित करता है तो मेरी कलम स्वयंमेव चलने लगती है। मेरे लिए लिखना कोई अय्याशी नहीं है, इसीलिए मैं लेखन केवल लेखन के लिए जैसी धारणा में विश्वास नहीं रखता। लिखने के पीछे कोई ठोस कारण और उद्देश्य होना आवश्यक है। न ही मैं स्वांखत: सुखाय लेखन की बात समझ पाता हूं। मैं अपने प्रत्येक लिखे हुए शब्द के माध्यम से अपनी बात आम पाठक तक पहुंचाना चाहता हूं। हां यह सच है कि मैं हिन्दी के मठाधीशों को प्रसन्न करने के लिए भी नहीं लिखता। मुझे एक अनजान पाठक का पत्र किसी बड़े आलोचक की शाबाशी के मुक़ाबले कहीं अधिक सुख देता है। लेकिन वहीं यह भी एक ठोस सच्चाई है कि जब कभी किसी स्थापित लेखक या आलोचक ने मेरी रचना को सराहा है, मन को अच्छा लगा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); "&gt;आपकी निगाह में लेखक एक आम आदमी से किस प्रकार भिन्न होता है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; मुझे लगता है कि परिष्कृत सोच एवम् संवेदनशीलता एक लेखक को एक आम आदमी से अलग करती है। अब देखिये कनिष्क विमान की दुर्घटना एक आम आदमी को भी आंदोलित करती है और एक लेखक को भी। जहां आम आदमी समय के साथ साथ उस घटना को भुला देता है, वहीं एक संवेदनशील लेखक उस घटना को अपने दिमाग़ में मथने देता है। समय के साथ साथ वह घटना तो अवचेतन मन में चली जाती है, लेकिन एक रचना का जन्म हो जाता है। जहां आम आदमी अपने आप को केवल घटना तक सीमित रखता है, वहीं एक अच्छा लेखक उस घटना के पीछे की मारक स्थितियों की पड़ताल करता है और एक संवेदनशील रचना रचता है। मैं लेखन के लिये किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा का पक्षधर होना आवश्यक नहीं समझता।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आप अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान किस मानसिकता से गुज़रते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; मेरे लिए रचना प्रक्रिया कोई नियमबद्ध कार्यक्रम नहीं है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। आसपास कुछ न कुछ घटित होता है जो कि मन को उद्वेलित करता है। दिल और दिमाग़ दोनों ही उस के बारे में जुगाली करते रहते हैं। और फिर एकाएक रचना पहले दिमाग़ में और फिर पन्नों पर जन्म लेती है। कहानी के मुक़ाबले मैं पाता हूं कि कविता के लिए उतना सोचना नहीं पड़ता। ग़ज़ल या कविता जैसे स्वयं उतरती चली आती है। यदि मैं चाहूं भी तो सायास ग़ज़ल या कविता नहीं लिख पाता जबकि कहानी के लिए रोज़ाना कुछ पन्ने काले किए जाते हैं चाहे उन्हें खारिज ही क्यों न करना पड़े। मेरे पहले ड्राफ़्ट में खासी काटा पीटी होती है क्योंकि मैं लिखते लिखते ही सुधार भी करता जाता हूं। कहानी लिखने की प्रक्रिया में कंसंट्रेशन अधिक समय तक बनाए रखना पड़ता है। मेरी एक कोशिश ज़रूर रहती है कि मैं अपने चरित्रों की मानसिकता, सामाजिक स्थिति एवं भाषा स्वयं अवश्य समझ लूं, तभी अपने पाठकों से अपने चरित्रों का परिचय करवाऊं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;अब तो आपको लंदन आए करीब दस वर्ष हो गये।  क्या इससे आपके नज़रिए में परिवर्तन आया है? इससे पहले भी आप पूरी दुनिया घूम चुके हैं। आप इस सारे परिदृश्य में हिन्दी लेखन को कहां पाते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; देखिये पहले मैं एक एअरलाईन के क्रू मेम्बर की हैसियत से विदेश जाया करता था। विदेश के जीवन को एक तयशुदा दूरी से देखता था, उसे उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाता था जितना कि आज। मेरा आज का संघर्ष मुझे अप्रवासी भारतीय की सभी दिक्कतों और सुविधाओं से परिचय करवाता है। मुझे लगता है कि भारत के बाहर यदि कहीं हिन्दी साहित्य की रचना  बड़े पैमाने पर हो रही है तो वो है युनाइटेड किंगडम। यहां बहुत से स्तरीय कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और ग़ज़लकार सक्रिय हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;लंदन में बसने के पश्चात आपके लेखन में सकारात्मक या नकारात्मक, किस प्रकार का प्रभाव पड़ा है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;मधु जी, पहले नकारात्मक । लंदन आने के पश्चात पहले तो वही नॉस्टेलजिया वाली बात कि बात बात पर भारत को मिस करना और याद करके परेशान होना। मैं जब जब कलम उठाऊं तो भारत को ले कर ही कुछ न कुछ काग़ज़ पर उतरना शुरू कर दे। मैने बहुत से पन्ने लिखे और फाड़ दिये। मुझे विदेश में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य से यह शिकायत है कि दो एक रचनाकारों को छोड़ कर वहां का हिन्दी लेखक नॉस्टेलजिया से बाहर नहीं आ पाता। वह अपने आप को अपने स्थानीय समाज के साथ जोड़ नहीं पाता और इसलिए ऐसे समाज के बारे में लिखता है जिसे वह पीछे छोड़ आया है। मज़ेदार बात यह है कि जिस समाज को वह पीछे छोड़ आया है, वह भी बदल जाता है। अंतत: वह किसी ऐसे समाज के बारे में लिखने लगता है जो वास्तविक है ही नहीं। वह समाज केवल उसके दिल-ओ-दिमाग़ में रहता है। सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि मैंने इंगलैण्ड के समाज को समझने का प्रयास किया, वहां के गोरे आदमी की मानसिकता को जानने की कोशिश की और एक मुहिम चलाई की हिन्दी लेखक विदेश में किए गये अपने संघर्ष या अपने आसपास के जीवन को समझने का प्रयास करें और उसे ही अपने लेखन का विषय बनाए। क़ब्र का मुनाफ़ा, तरक़ीब, कोख का किराया, मुझे मार डाल बेटा, ये क्या हो गया, गंदगी का बक्सा, बेघर आंखें मेरे इन्हीं प्रयासों का फल हैं। हां वहीं यह भी सच है कि इंदु शर्मा कथा सम्मान के अंतर्राष्ट्रीय हो जाने और कथा (यू.के.),  द्वारा लगातार कथा गोष्ठियों के आयोजन से मेरे लेखन की निरंतरता में कमी आई है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;साहित्य में अश्लीलता के प्रश्न पर आप क्या कहना चाहेंगे?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;आज के संदर्भ में यह प्रश्न थोड़ा आप्रसांगिक हो गया है। कोई भी चीज़ अपने संदर्भों के तहत ही अश्लील हो सकती है। जैसे भारत को स्वतंत्रता मिलने से पहले भारतीय सिनेमा का सबसे लम्बा चुम्बन पर्दे पर कलाकार हरि शिवदासानी (करिश्मा एवं करीना कपूर के नाना) ने लिया था, और वह अश्लील नहीं माना गया। फिर एक ऐसा समय आया कि हीरो हीरोईन कूल्हे मटका मटका कर अश्लील इशारे करते थे किन्तु उनको अश्लील नहीं माना जाता था, जबकि चुम्बन को अश्लील माना जाने लगा। यही हाल डी.एच. लॉरेंस के उपन्यास लेडी चैटरलीज़ लवर के बारे में कही जा सकती है कि जब उसका प्रकाशन हुआ था, उसे अश्लील मान कर उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जबकि आज यही उपन्यास आसानी से हर जगह उपलब्ध है। मृदुला गर्ग के बोल्ड दृश्यों और भाषा पर भी आज कोई बात नहीं करता। यानि कि अश्लीलता के संदर्भ समय और काल के साथ साथ बदलते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आप यू.के. हिन्दी लेखन के विषय में कुछ बताएं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div   style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; float: right; font-weight: normal; line-height: 100%; padding-bottom: 7px; padding-top: 7px; text-align: justify; width: 260px;font-size:10pt;color:blue;"&gt;&lt;span style="font-size:small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 119px; height: 166px;" src="http://i447.photobucket.com/albums/qq194/sahityashilpi/madhu1.jpg" border="0" width="130" /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(122, 55, 139); font-weight: bold;"&gt; रचनाकार परिचय:-&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;&lt;a href="http://parichay.sahityashilpi.com/2009/01/blog-post_31.html"&gt;मधु अरोड़ा&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;का जन्म जनवरी, १९५८ को हुआ। आप वर्तमान में भारत सरकार के एक संस्थान में कार्यरत हैं आपने अनेक सामाजिक विषयों पर लेखन, भारतीय लेखकों के साक्षात्कार तथा स्वतंत्र लेखन किया है। आपकी आकाशवाणी से कई पुस्तक-समीक्षायें प्रसारित हुई हैं। आपका मंचन से भी जुड़ाव रहा है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा - &lt;/span&gt;मैं जब भारत में रहता था तो मैंने यू.के.  के केवल एक ही साहित्यकार के बारे में सुन रखा था या उनकी कविता पढ़ रखी थी। वे साहित्यकार हैं डा. सत्येन्द श्रीवास्तव - जिन्हें कथा यू.के. द्वारा प्रथम पद्मानंद साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। यहां आकर मैंने पाया कि कविता विधा को ले कर यहां बहुत से साहित्यकार सक्रिय हैं। वहीं कहानी क्षेत्र में एक वैक्यूम सा दिखाई दे रहा था। इस वैक्यूम को भरने की शुरूआत कथा यू.के. ने कथा गोष्ठियां आयोजित करके यूनाइटेड किन्गडम में हिन्दी कहानी लेखन का माहौल पैदा करने का प्रयास किया। कथा यू.के. ने सूरज प्रकाश के संपादन में कथा - लंदन जैसा कहानी संग्रह प्रकाशित करवाया जिसमें वे कहानियां शामिल हैं जिन्हें कथागोष्ठियों में पढ़ा गया । इस संग्रह की एक विशेषता यह भी है कि इसमें उन कथागोष्ठियों की रिपोर्टें भी शामिल थीं जिनमें इन कहानियों को पढ़ा गया था। इस तरह हमने केवल लेखक ही नहीं पाठकों और श्रोताओं का स्तर भी विश्व तक पहुंचाया । कथा यू.के. ने सूरज प्रकाश के ही संपादन में एक कहानी संग्रह प्रकाशित करवाया है कथा दशक जिसमें दस इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित कथाकारों की रचनाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;इंदु शर्मा कथा सम्मान अब अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर चुका है, इसकी भावी योजनाएं क्या हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; देखिये अभी तक इंदु शर्मा कथा सम्मान के साथ केवल सम्मान ही जुड़ा है। हमारी योजना है कि इस सम्मान के साथ साथ इसे पुरस्कार भी बनाया जाए और इसके साथ एक सम्मानजनक राशि भी जोड़ी जाए। लेकिन एक बात साफ़ करना चाहूंगा कि यह सम्मान एक लेखक द्वारा एक लेखिका की याद में लेखकों को दिया जाता है। और इस सम्मान के आयोजन में भी एक लेखक (सूरज प्रकाश) ही जुड़ा है। तो यह एक लेखकीय मामला है जिसके साथ भावनाएं जुड़ी हैं,कोई अमीर ट्रस्ट या धन्ना सेठ नहीं जुड़ा है। इस पुरस्कार के साथ हमारे पूरे परिवार जुड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;भारत में यह सम्मान 40 वर्ष से कम उम्र के कथाकारों को दिया जाता था। किन्तु लंदन में उम्र और विधा की सीमा हटा दी गई है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे संभावनाशील कथाकारों का हक़ मारा गया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;मधु जी, जब किसी भी वस्तु का आकार बदलता है तो टुकड़ों में ही बदले ऐसा आवश्यक नहीं है। भारत में इंदु शर्मा कथा सम्मान का अपना एक स्वरूप था लेकिन जब उसे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने की बात हुई तो बहुत से पहलुओं पर विचार करना पड़ा। कथा तो कहानी भी है और उपन्यास भी। यानि कि कहानी के साथ उपन्यास को भी जोड़ दिया गया। आज का संभावनाशील लेखक ही कल का प्रतिष्ठत लेखक बन जाता है। यानि कि अब इस सम्मान के साथ आरक्षण नीति को समाप्त कर के इसे खुले बाज़ार में खड़ा कर दिया है। जो भी पुस्तक सर्वश्रेष्ठ होगी स्वयं ही सम्मान की हकदार हो जाएगी। हम लेखक को पहले भी पुरस्कृत नहीं करते थे और आज भी नहीं करते। पहले भी कृति का सम्मान होता था और आज भी। चालीस वर्ष से कम उम्र के लेखक इस सम्मान के घेरे से बाहर नहीं कर दिये गए। वास्तव में एक युवा लेखक का उपन्यास काला पहाड़ अंतिम दो तक पहुंच गया था। अब इस सम्मान के साथ आयु सीमा जैसी कोई बात नहीं है। इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है, शर्त केवल एक ही है कि रचना उत्कृष्टं होनी चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;ख़ैर, आपकी कहानियों में मृत्यु, अकेलापन, डर, बुढ़ापा, बेमेल विवाह बार बार आते हैं। इसकी कोई ख़ास वजह?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; मधु जी कोई भी लेखक वही लिखता है जो देखता है या फिर भुगतता है। मैंने मौत को बहुत क़रीब से देखा है। पहले पिता जी की दिल की बीमारी से मृत्यु और फिर इंदु जी की कैंसर से मौत। इसके पहले भी विमान दुर्घटना में तीन सौ उनतीस यात्रियों की मृत्यु जैसे हादसे किसी भी लेखक को लिखने के लिए मजबूर कर देंगे। फ़्लाइट परसर होने के नाते मैने विदेश में बहुत से डरे हुए भारतीयों को देखा है। कुछ खोने का डर मैंने महसूसा है। अपने पिता की उनके बुढ़ापे में मदद ना कर पाने का अपराधबोध मुझे हमेशा सालता है। ज़ाहिर है कि यह सब थीम मेरी कहानियों में आ ही जाते हैं। वैसे मेरी कहानियों का एक महत्वपूर्ण थीम सम्बन्धों में आता खोखलापन और जीवन पर हावी होती भौतिकता भी है। मेरी पहले की कहानियां जैसे कि देह की कीमत, काला सागर, ढिबरी टाईट, कड़ियां, इत्यादि में आपको यह थीम दिखाई देंगी। मेरी आज की कहानियों में आपको इंगलैण्ड का भारतीय या गोरा समाज दिखाई देगा। जैसे पिछले तीन वर्षों से मेरा उठना बैठना लंदन के मुस्लिम समाज में खासा रहा क्यों कि मैं एक ऐसे बैंकर की आत्मकथा लिख रहा था जिसका जन्म कानपुर में हुआ, पढ़ाई कराची में और उसने लंदन में हबीब बैंक को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। शायद इसी कारण मेरी पिछली कुछ कहानियां जैसे कि एक बार फिर होली, क़ब्र का मुनाफ़ा, दीवार थी दीवार नहीं थी, तरकीब, और होम-लेस में मुस्लिम थीम उभर कर सामने आए हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;लेखन में जब आप ख़ुद को उलझा पाते हैं, तो क्या करते हैं?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 0); font-weight: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;ऐसा कई बार हो जाता है कि आपने रचना शुरू की और रास्ते में ही उलझ गये। कुछ एक रचनाएं मैंने तीन वर्ष पहले लिखनी शुरू की थीं, लेकिन वे पूरी नहीं हो पाईं हैं। यानि कि मिस-कैरिज जैसा कुछ हो गया। लेकिन ऐसा भी हुआ है कि कोई रचना छ: महीने के बाद उठाई और वहीं से दोबारा शुरू हो गये जहां कि छोड़ी थी। लेकिन मैं बीच बीच में ग़ज़ल या कविता भी लिखने का प्रयास कर लेता हूं। इस से थोड़ा चेन्ज मिल जाता है। वैसे संस्थागत कार्यों की वजह से भी लेखन कई बार हार जाता है। लेकिन लिखे बिना चैन भी तो नहीं मिलता है न।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;जब आप नहीं लिख रहे होते हैं तो क्या कर रहे होते हैं?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 0); font-weight: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; नहा रहा होता हूं, भोजन खा रहा होता हूं, दफ़्तर में काम कर रहा होता हूं, । यानि कि रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त होता हूं। मधु जी, लेखक का लेखन केवल काग़ज़ पर ही नहीं होता। लेखक हर समय सामग्री जुटाता रहता है। उसका दिमाग़ कभी शांत हो कर आराम नहीं कर पाता। उसे आसपास के लोगों और घटनाओं से थीम, चरित्र और प्लॉट मिलते हैं। इसलिए लेखक हर वत्त कुछ न कुछ लिख रहा होता है। सच्चा लेखक कभी भी न लिखने के कारण नहीं खोजता। उसे लिखने की आग आराम ही नहीं करने देती।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आप समकालीन लेखन में अपने आप को कहां पाते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;यह तो कोई आलोचक ही बता पाएगा। वैसे समकालीन लेखन में चर्चा उन्हीं लोगों की हो पाती है जो किसी गुट विशेष से जुड़े होते हैं। मुझे याद आता है कि एक कथागोष्ठी में मैंने अपनी कहानी देह की कीमत का पाठ किया था। मेरी यह कहानी जगदम्बा प्रसाद दीक्षित जी की प्रिय कहानियों में से है। उस गोष्ठी में साजिद रशीद साहब ने भी अपनी कहानी का पाठ किया था। भाई आत्माराम उस गोष्ठी में देर से आए इसलिए साजिद रशीद की कहानी सुन नहीं पाए। मेरी कहानी भी उन्होंने आधी ही सुनी। वे बोलने के लालच से बच नहीं पाए और खड़े हो कर बोले,"मैं साजिद रशीद की कहानी सुन नहीं पाया, लेकिन मैं जानता हूं कि उनकी कहानी अच्छी ही होगी क्योंकि उनके पास एक परिपक्व राजनीतिक दृष्टिकोण है। ऐसे में जब किसी पाठक का एक पत्र भी आ जाता है तो बहुत प्रस्न्नता होती है। मेरा काम केवल लिखना है। यदि मैंने अच्छा लिखा है तो मेरा लेखन स्वयं ही अपनी जगह बना लेगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आपको समकालीन लेखकों में कौन कौन से अच्छे लगते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt; दरअसल मुझे लेखकों से अधिक उनकी कृतियां प्रिय होती हैं। जैसे जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का मुर्दाघर, पानू खोलिया का सत्तर पार के शिखर, जगदीश चंद का कभी न छोड़ें खेत, श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी, हिमांशु जोशी का कगार की आग, ज्ञान चतुर्वेदी का बारामासी, चित्रा मुद्गल का आंवां, संजीव का जंगल जहां शुरू होता है, सूरज प्रकाश का देस बिराना, नरेन्द कोहली की दीक्षा, विभूति नारायण राय का तबादला मेरी प्रिय पुस्तकों में से हैं। इस का अर्थ यह नहीं कि बस यही हैं। और भी बहुत सी कहानियां और उपन्यास हैं जिन्हें मैं अपने बहुत करीब पाता हूं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;क्या आप अपने लेखन से संतुष्ट हैं?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 0); font-weight: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;संतुष्ट होने का अर्थ होगा कि लिखना बंद। हां कोई भी रचना पूरी होने के बाद एक विचित्र सी संतुष्टि का आभास होता है। लेकिन तुरंत मन कहता है कसर रही कसर रही और अंदर का लेखक अगली चुनौती के लिए तैयार हो जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;क्या आप अपने देश भारत को छोड़ने की कचोट महसूस करते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;देखिए मुंबई में जितने भी हिंदी के कवि हैं वे सब किसी अन्य शहर, गांव या कस्बे से आए हैं। उनके लेखन में उस स्थान की तड़प देखी और महसूस की जा सकती है। इसी को नॉस्टेलजिया कहा जाता है। मैं झूठ बोलूंगा यदि कहूं कि मैं मुंबई की यादों को लेकर परेशान नहीं होता। लेकिन जब दिल्ली छोड़ कर मुंबई आया था तो दिल्ली को लेकर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि रहने के लिए लंदन एक बेहतरीन जगह है। यहां टुच्चा भ्रष्टाचार कहीं नहीं है। मेरी सोच यह है कि मैं एक अच्छी जगह रह रहा हूं। जब कभी मेरे दिल में यादें एक तूफ़ान खड़ा कर देती हैं तो मैं टिकट कटवा कर भारत आ जाता हूं। आम इन्सान के लिये ब्रिटेन में ख़ास ख़्याल रखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;साहित्य में जो मेन-स्ट्रीम को लेकर एक सोच बनी हुई है, उसके बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या यह सही मायने में मुख्यधारा है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 0); font-weight: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;मधु जी हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा वह है जिसमें लेखक और पाठक दोनों एक ही हैं। यदि आप मार्क्सवाद से प्रभावित हैं और आप के थीम मज़दूर, किसान, बाज़ारवाद, भ्रष्टाचार और सरकार विरोध  हैं तो आप इस मुख्यधारा का हिस्सा हैं। अन्यथा आप कितना भी अच्छा लिखते हों, आप इस धारा में नहीं तैर सकते। इस मुख्यधारा का पाठकों के साथ कोई रिश्ता नहीं। यहां आप आलोचकों की वाहवाही के लिये लिखते हैं। मैं उस लेखन का पक्षधर हूं जो पाठक के साथ एक संवाद पैदा करे। साहित्य का पठनीय होना उसके महान होने की पहली शर्त है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आजकल कथा यू.के. लंदन में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के साथ मिलकर हिन्दी-उर्दू के बीच की खाई पाटने हेतु प्रयासरत है। क्या आप सोचते हैं कि कभी ऐसा हो पाएगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;देखिये एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की मुखिया काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी जी ने कथा यू.के. के कार्यक्रमों में बहुत सक्रिय सहयोग दिया है। हमारे हिन्दी लेखकों हेतु लंदन के  उर्दू लेखकों के साथ एक बातचीत का आयोजन ज़रूर करती हैं। हमारे हर काम को अपना काम मानती हैं। उन्होंने उर्दू से हिन्दी और हिन्दी से उर्दू में कहानियां अनुवादित करवाने का काम किया है। हिन्दी कहानियों की आडियो बुक्स भी बनवाई हैं। हमें लगता है कि यही काम तो कथा यू.के. का भी है। इसलिये एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के साथ मिलकर काम करना हमें अच्छा लगता है। हमारा काम है लगन, मेहनत और ईमानदारी से जुटे रहना, अब हम सफल हो पाते हैं या नहीं यह तो समय ही बताएगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; "&gt;आप पर बारबार आर.एस.एस. का पक्षधर होने का आरोप लगता रहा है। आप इस पर क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 102); font-weight: bold; "&gt;तेजेन्द्र शर्मा -&lt;/span&gt;मधु जी मैं भारत के किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं हूं। भारत में समस्या यह है कि यदि आप मार्क्सवादी नहीं हैं तो यह मान लिया जाता है कि आप दक्षिणपंथी हैं। यह तो कोई सही तरीका न हुआ। साहित्य में बहुत सी ज़मीन और भी है। मैं विचारधारा के साहित्य को महत्वपूर्ण नहीं मानता। मेरा मानना है कि साहित्य के लिये विचार ज़रूरी है न  कि विचारधारा। विचार मनुष्य के भीतर से जन्म लेता है जबकि विचारधारा ऊपर से थोपी जाती है। जब जब मुझ पर राजनीतिक आरोप लगाए जाते हैं, मैं मुस्कुरा भर देता हूं। मैं यह कह सकता हूं कि मेरी कहानियां एक ही रंग, देह की कीमत, काला सागर, तरकीब, मुझे मार डाल बेटा, कड़ियां, क़ब्र का मुनाफ़ा, पासपोर्ट का रंग या फिर कोई भी और कहानी पढ़ कर बताइये कि मेरी कौन सी कहानी आर.एस.एस. विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है। मेरी रचनाएं प्रमाण हैं इस बात का कि मैं केवल आम आदमी के बारे में सोचता हूं किसी राजनीतिक विचारधारा का ग़ुलाम नहीं हूं।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/125616184089130577-593937183647037894?l=bikharemoti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bikharemoti.blogspot.com/feeds/593937183647037894/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=125616184089130577&amp;postID=593937183647037894' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/593937183647037894'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/593937183647037894'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bikharemoti.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='प्रसिद्व कथाकार तेजेन्द्रर शर्मा से बातचीत [साक्षात्कार] - मधु अरोड़ा'/><author><name>साहित्य-शिल्पी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03337085754343699108</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BR8jbtvir7g/SMnNChdyKzI/AAAAAAAAALU/m4mx3lCCz5I/S220/logo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://i447.photobucket.com/albums/qq194/sahityashilpi/poster/th_bachchan1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-125616184089130577.post-2623527919865740939</id><published>2008-12-24T19:25:00.000+05:30</published><updated>2008-12-24T19:53:41.099+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तेजेन्द्र शर्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>ईटों का जंगल - तेजेन्द्र शर्मा</title><content type='html'>पत्र मेरे सामने रखा था।  रामप्रकाश एंड कंपनी का नाम उस पर सुनहरे अक्षरों से छपा था। उस कागज़ क़े पुतले ने मेरे सारे सपनों को धाराशायी कर दिया था।  मेरा चहकना अचानक उडन-छू हो गया था। मेरी पत्नी तो जैसे बेहाश होने को थी। कभी उसने भी रामप्रकाश एंड कंपनी के सुनहरे अक्षरों जैसे सुनहरे सपने देखे थे। बंबई जैसे महानगर में सपने ही तो मनुष्य को जीवित रखते हैं। धारावी, माहीम, कुर्ला और सारे उपनगरों की झोंपडपट्टियों में जी रहे लोग किसी सपने के सहारे ही तो अपना जीवन बिता रहे हैं। इसी शहर में रामप्रकाश ने हमें भी एक सपना दिखा दिया था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सपने तो मैं दिल्ली में भी बहुत देखता था। वहां अपना घर है। घर! हां, सचमुच का घर! बंबई के कबूतरखानों से कहीं भिन्न आँगन, सहन, बाग, सात कमरे, दो गुसलखाने, नौकरों के कमरे और हमारी प्यारी कुतिया लिजा का कमरा। इतना सब होते हुए भी मुझे बंबई आने की क्या आवश्यकता थी? पिताजी का अच्छा-खासा व्यवसाय है। और मैं उनका इकलौता पुत्र! मेरे साथी भी तो मुझसे इर्ष्या करते थे। लाला धर्मराज का इकलौता वारिस - उनकी तीन मिलों का भावी मालिक! सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। फिर एकाएक क्या हो गया? क्यों मैं बगावत पर उतारू हो गया? कैसे इस मायानगरी में चला आया मैं? उस पत्र को देखकर मैं उछल उठा था। एअरलाइन ने मुझे नौकरी दे दी थी-फ्लाइट परसन की।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पत्र तो यह भी आया था, नीले कागज पर सुनहरे अक्षर लिये, किंतु काले रंग के टाइप किये शब्दों ने नीले और सुनहरे रंग को जहरीला-सा बना दिया था। रोहिणी सुबक रही थी। मैं कभी उसे ढाढस बंधाता और कभी स्वयं को संयत करने की कोशिश करता। एक ठंडा काला सन्नाटा घर में छा गया था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्यार! हां, यही तो किया मैंने। मैं रोहिणी को प्यार करने लगा तो ऐसा क्या गुनाह हो गया था ? पिताजी तो गरीब घर से ही बहू लाना चाहते थे। उन्हें तो दहेज से कोई लगाव नहीं था, किंतु जात-बिरादरी के मामले में कट्टरपन उनमें जैसे कूट-कूटकर भरा था! लव-मैंरिज के नाम से ही उन्हें चिढ थी। बडों का अस्तित्व उन्हें हिलता दीखने लगता था। नाराज तो रोहिणी के परिवार वाले भी हुए थे। हम दोनों अकेले पड ग़ये थे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अकेले! अकेले तो हम आज भी हैं। मेरे पिता कोई फिल्मी पिता नहीं, जो कुछ दिनों बाद हमें अपने सीने से लगा लेते। उनके उसूल तो संम्भवतः भगवान भी न बदल पायें। हां, ससुरालवालों ने अवश्य हमारे प्यार को समझने की कोशिश की। कुछ समय बाद उन्होंने हमें माफ भी कर दिया। इस सुरसा नगरी में हम दोनों तीन होने की प्रतीक्षा में हैं, तीन महीने में रोहिणी माँ बनने वाली है। मेरी माँ तो पिताजी के हुक्म के बिना साँस भी नहीं ले सकती। रोहिणी की माँ अब हमसे नाराज तो नहीं हैं, पर इतनी प्रसन्न भी नहीं हैं कि प्रसव करवाने के लिए हमारी सहायता करने बंबई आ जायें। ऊपर से यह पत्र! अब तो हमें काणे साहब भी टका-सा जवाब दे चुके हैं। इस फ्लैट को भी दो महीने में खाली करना है। जीवन एक बडा-सा प्रश्नचिन्ह बन गया है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रश्न! जब हम दोनों बंबई पहुंचे तो भी यही प्रश्न हमारे सामने मुँह बायें खडा था कि कहाँ रहें। करोडपति बाप का इकलौता बेटा! पहली बार अकेला अपने पैरों पर खडा होने की कोशिश कर रहा था। पहले दिन जिस होटल में भी रहने के बारे में सोचा, वही अपनी जेब से ऊँचा दिखायी दिया। जैसे-तैसे करके, कांदिवली में एक होटल पचास रूपये रोज पर तय हुआ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सारा शहर ऊँची-ऊँची इमारतों से घिरा पडा है - ईटों का जंगल। उन माचिसनुमा बिल्डिगों में मैं भी अपने लिए एक घोंसला तलाश रहा था। रोज दफ्तर के बाद दलालों के आगे घिघियाता सा पहुँच जाता। सबके सब साले मक्कार थे। पंद्रह-बीस हाजर की डिपाजिट और छः से आठ सौ रूपये किराया - इससे नीचे तो कोई बात ही नहीं करता। और यह हाल था उपनगर का। शहर में तो कोई किराये पर फ्लैट देने की बात ही नहीं करता।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बात जयकर ने की थी - ग्रांट रोड और कोलीवाडा की बात की थी। कोलीवाडा के नाम से एक सरकारी कॉलोनी का जिक्र भी आया। मन में एक नयी आशा जाग उठी। बहुत सुंदर-सा नाम बताया था उसने - एंटॉपहिल! सुनकर लगा, जैसे मालाबार हिल या पाली हिल के समान कोई सुंदर सी जगह होगी। पहली बार जब वहाँ गया तो सच्चाई की कडवाहट ने थू-थू करवा दी। बांदरा हाइवे पार करते ही एक सडांध दिमाग में घुसने लगी। और फिर आया धारावी-गंदगी की पराकाष्ठा! शाम का समय था। कोलीवाडा की वेश्याएं अपना बाजार सजाये सडक़ों पर घूम रही थीं। मन में एक अजीब-सी धारणा घर करती जा रही थी। आखिर एंटॉपहिल आ ही पहुंचा। सेक्टरों में बंटी हुई सरकारी कॉलोनी। चारों ओर से झोंपडियों से घिरी. एक ओर से चैंबूर के कारखाने से आती धुएं की लकीरें तथा रसायनों की गंध, तो दूसरी ओर जरायम पेशा लोगों का डर।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हाँ, वहां कच्ची शराब बनाने वालों की झोंपडियाँ भी थीं। वहां भी फ्लैट मिलना क्या आसान था? हर दूसरे घर में दलाल! फ्लैट की शर्तें सुनकर बहुत घबराहट होती। ग्यारह महीने का किराया इकट्ठा लेने का रिवाज है वहाँ। दो या तीन महीने का किराया दलाली के रूप में भी देना पडता है। हमारा दलाल छोटेलाल भी तो कम घाघ नहीं था। बात करते हुए खीसें बहुत निपोरता था। बहुत चक्कर लगवाये उसने भी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चक्कर लगाने के सिवा मैं कर भी क्या सकता था! फिर जैसे भगवान ने हमारी सुन ली। छोटेलाल ने हमें चौथी मंजिल पर एक कबूतरखाना दिलवा ही तो दिया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;''हें-हें-हें देखो सेठ, चौथी माला का अपना फायदा है। एक तो चोरी-चकारी का डर नहीं, पानी की टंकी भी ठीक ऊपर है, और फिर मेहमान भी कम आयेंगे। कौन चढेग़ा चार-चार माला!''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हमें तो रोज चढनी थीं वे चार मंजिलें, किंतु फिर भी छोटेलाल हमारे लिए जैसे भगवान का अवतार था। उसने हमें कांदिवली के बदबूदार कमरे से उठाकर चौथी मंजिल की फर्राटेदार हवा में ला बिठाया था। जीवन कुछ चलने लगा था। रोहिणी को अब मेरे पीछे अकेले रहने में उतनी परेशानी नहीं होती थी। मेरी नौकरी भी तो अजीब-सी है। सारा समय घर में ही बीतता है या फिर भारत से बाहर ही रहना होता है। कई बार तो मेरा टूर दस-बारह दिन का भी हो जाता है, परंतु रोहिणी के चेहरे पर पीड़ा की एक लकीर-सी खिंच जाती। अकेलेपन से कहीं अधिक उसका एहसास हमें झकझोर देता था। कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं था, जिसका वास्ता देकर किसी को हम अपने यहाँ बुला लेते।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बुलाने की आवश्यकता ही नहीं पडी। वह बिना बुलाये ही आ धमके। सारी कॉलानी में शोर मचा हुआ था -'चैकिंग हो रही है। चैकिंग!' यह क्या होती है? और तभी छोटेलाल भी हांफता हुआ आ ही पहुंचा, ''नरेंद्रजी, जल्दी कीजिए, फ्लैट को ताला लगाकर कहीं निकल चलिए। आज चैकिंग हो रही है। किसी ने कंप्लेंट कर दी है कि अलॉटी लोगों ने फ्लैट किराये पर चढा रखे हैं। जल्दी करो साहिब, रात को वापस आ जाइएगा.'' हडबडाहट में फ्लैट को ताला लगाया और किंग सर्कल स्टेशन की ओर चल दिये। समझ में नही आ रहा था कि जायें तो जायें कहाँ? रोहिणी भी बदहवास-सी हो रही थी। शाम तक निरूद्देश्य वीटी से गेटवे तक घूमते रहे। सब कुछ बहुत बेमानी-सा लग रहा था। रात ढलने पर वापस पहुंचे। शोर शांत हो चुका था। न तो मुझे ही भूख थी और नही रोहिणी खाना बनाने की स्थिति में थी। दोनों यों ही पडे रहे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पडे रहने से तो कोई काम बनता नहीं। फिर से एक बार फ्लैट की तलाश शुरू कर दी। वैसे भी ग्यारह महीने पूरे होने को थे। हमारे दलाल की खीसें फिर से निपुरने वाली थीं। अब दोबारा इस चैकिंग का सामना करने की हिम्मत नहीं थी हम दोनों में।  एक गुजराती महिला को हम पर दया आ गयी। उसने अपना अंधेरीवाला फ्लैट हमें किराये पर देना स्वीकार कर लिया। उसने कहा ''हफ्ते-पंद्रह दिन में किसी भी दिन आ जाओ।'' उसे डिपॉजिट भी कोई चाह न थी ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;किंतु छोटेलाल को तो अपनी दलाली की चाह थी, ''अरे नरेंद्रजी, दस महीने तो हो चुके। आप अगले ग्यारह महीने का किराया भी दे ही डालिए। और आपके लिए एक स्पेशल छूट, अब की बार आपसे दो महीने की दलाली नहीं लूंगा, सिर्फ एक महीने से काम चल जायेगा।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;गुजराती महिला के आश्वासन ने मुझमें बहुत आत्मविश्वास जगा दिया था। मैं बोल ही तो पडा, ''दलाली किस बात की छोटेलाल! दलाली तो एक ही बार ही दी जाती है, जो हम दे चुके हैं। अब कोई दलाली वलाली नहीं देंगे हम।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;छोटेलाल कुछ गडबडा-सा गया। यह भाषा और धमकी दोनों ही उसके लिए अप्रत्याशित थीं, किंतु उसने हार मानना कहाँ सीखा था, ''यह तो और भी बढिया हुआ। अब नया ग्राहक तो दो-तीन महीने की दलाली देगा ही। चाबी लेने परसों हाजिर हो जाऊंगा।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सामान ट्रक में लदवा रहा था।  दिमाग उत्तेजना से भरा था। मन-ही-मन छोटेलाल को लाखों गालियाँ दे चुका था और उस गुजराती महिला को दुआएं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अंधेरी पहुंचकर जीवन का सबसे काला अंधेरा देखा था मैंने। सामान ट्रक में लदा पडा था। मैं और रोहिणी उस गुजराती महिला के पास चाबी लेने पहुंचे तो उसने फ्लैट देने से साफ इन्कार कर दिया। उसे कोई बीस हजार डिपाजिट देने वाला मिल गया था। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। मन हुआ कि इस महिला का खून कर दूं। हमें सडक़ पर ला खडा किया था उसने। आसमान में बादल गरज रहे थे। बंबई की बरसात का कोई भरोसा है? उसी समय ट्रक छोटेलाल के घर की ओर मुडवा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटेलाल ने अभी गिलास में रम डाली ही थी। मुझे देखकर भी अनदेखा कर दिया उसने।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;''छोटेलालजी, बहुत मुसीबत में फँस गया हूं। आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''अरे नरेंद्रजी, मुझ गिरे हुए इन्सान के मुँह लगने आप कहाँ आ गये! आप तो अंधेरी में रहनेवाले थे! एंटॉपहिल तो गुडों का इलाका है !''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''छोटेलालजी, मेरी बदतमीजी, मेरी गुस्ताख़ी को माफ कर दीजिए। हमें हमारा फ्लैट वापस कर दीजिए। आप जितनी दलाली चाहें, ले लें। इस समय तो हम सडक़ पर खडे हैं। थोडा उपकार कर दीजिए।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संभवतः मेरी आंखों में घुटे हुए आँसुओं ने छोटेलाल पर थोडा असर किया था। वह तीन महीने की दलाली लेकर हमें फ्लैट वापिस देने को तैयार हो गया। जैसे सामान उतारा था, वैसे ही चढाने लगे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इस हादसे के बाद हम काफी हिल-से गये। एक दिन रात को सोते समय रोहिणी बहुत प्यार से बोली, ''सुनिए, जो थोडा-बहुत गहना हमारे पास है, उसे बेच देते हैं। एक छोटा-सा घर खरीद लेते हैं। जब हाथ खुला होगा तो गहने फिर से बनवा लेंगे।'' मुझे एक झटका-सा लगा। मेरी पत्नी इतनी दूर की सोच रही है और मैं अभी कौडियाँ मिलाने के चक्कर में हूं। यह सुनकर स्वयं को कुछ हीन-सा अनुभव करने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन ऑफिस के नोटिस-बोर्ड पर एक सूचना टंगी देखी। यूं लगा, जैसे में इसी सूचना की प्रतीक्षा में था। जुहू में इतने सस्ते दामों में फ्लैट! वह भी समुद्र-तट को छूता हुआ! पत्नी को भी विचार पसंद आया। गहने लेकर उसी सुनार के पास पहुँचा, जहाँ से बनवाये थे। गहने खरीदते समय तो बनवाई भी ली थी उसने। अब बोला, "सेठ, बीस परसैंट तो टांके में जायेगा।" मरता क्या न करता! वही ले लिया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;और भी जहाँ-जहाँ से पैसा इकट्ठा कर सकता था, किया। पैसा लेकर चीफ प्रोमोटर काणे साहब के पास एकाउंट्स डिपार्टमेंट की ओर चला जा रहा था - मन में एयरलाइन की सोसाइटी का सपना लिये। एकदम से चालीस हज़ार रूपया कैश किसी अंजान व्यक्ति को देते डर-सा लग रहा था। जी कडा करके काणे साहब को पैसा दे ही दिया, साथ में बीस हज़ार रूपये का चैक। बाकी तो एयरलाइन से लोन लेना था। ब्लैक और व्हाइट का सिलसिला अब मुझे भी समझ आने लगा था। क्या विडंबना है - सचमुच के नोट तो ब्लैक हैं और पेन की काली स्याही से लिखा चैक व्हाइट है। काणे साहब कहे जा रहे थे, ''ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा। अगली दीवाली आप अपने घर में ही मनायेंगे!''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब मैं जब भी फ्लाइट पर विदेश जाता तो पैसे को दांतो तले दबाकर खर्च करता। रहता तो फाइव-स्टार होटलों में (एअरलाइन के खर्चे पर) परंतु खाना वहां के ढाबों में ही खाता। हैंबर्गर, हॉट डॉग, फ्रैंक-फ़र्टर या पिज़ा खाकर पेट भर लेता। रात को देर से, एक या दो बजे सोता ताकि सुबह देर से ही उठूं और नाश्ते का समय निकल जाये। दोपहर और रात के खाने पर गुजारा करता। कभी-कभी तो उसमें भी कोताही कर जाता। पैसे कुछ बचने लगे थे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हमारी बिल्डिंग की चिनाई पूरी हुई ओर पहला स्लैब पड गया। मन अपने स्वर्णिम भविष्य की पहली झलक देखकर झूम उठा। अब मैंने अपने ससुरालवालों पर भी रौब गाँठना शुरू कर दिया, 'बंबई में जुहू पर फ्लैट ले रहा हूँ! वे भी अपनी बेटी के भाग्य को सराह रहे थे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;छः महीनों में चार स्लैब पड ग़ये। जब तब एंटॉपहिल से निकलता, कोलीवाडा और धारावी की गंदगी में से गुज़रता, जुहू जा पहुंचता। बिल्डिंग की बढती हुई ऊंचाई जैसे मेरा जीवन ही बन गयी थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिर सीमेंट का अकाल पड ग़या । डोनेशनों के चक्कर शुरू हो गये। हमारी बिल्डिंग की ऊँचाई बढनी बंद हो गयी। काम रूक गया। हमारी बिल्डिंग का भविष्य, हम चालीस कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया। हम भागे-भागे काणे साहब के पास पहुंचे, "काणे साहब, आप हमारे चीप प्रोमोटर हैं, कुछ करिए, चार महीनों से काम बंद है!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम घबराओं नहीं। बिल्डिंग तो उसका बाप भी पूरी करेगा। उसकी चाबी मेरे हाथ में है।" काणे साहब अपनी मेज पर कपडा फेरते हुए बोले। उनकी मेज के कांच के नीचे दबे साई बाबा संभवतः हमारी मुश्किल समझ रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ग्यारह महीने और बीत गये। छोटेलाल की खीसें फिर एक बार निपुर आयीं। बुझे मन से ग्यारह महीने का किराया एवं उसकी दलाली एक बार फिर उसके हवाले कर दी। रोहिणी का माथा थोडा ठनका, "सुनिए जी, यह बिल्डर मकान बनायेगा भी क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"घबराओ नहीं, सब ठीक हो जायेगा।" मैं रोहिणी से अधिक स्वयं अपने-आपको आश्वस्त करते हुए बोला।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;और फिर आया रामप्रकाश एंड कंपनी का यह पत्र। हमारी आशाओं की बिल्डिंग इस पत्र का एक झटका भी नहीं सह पायी। हमारे बिल्डर ने लिखा था कि 'गृह-निर्माण की वस्तुओं के मूल्यों में वृध्दि हो गयी है। प्रार्थना है कि सौ रूपया प्रति फुट के हिसाब से और जमा करवाएं, अन्यथा वह बिल्डिंग पूरी नहीं कर पायेगा।"&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;काणे साहब के घर पहुंचे तो वह साई बाबा के कीर्तन में जाने की तैयारी कर रहे थे। आँखो में ही उन्होंने हमारे आने का सबब जान लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काणे साहब, हमारा पैसा इतने वर्ष रखकर, बिल्डर ने यह क्या पत्र भेजा है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"देखो भाई लोग, हम कर क्या सकते हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उसे कोर्ट मे घसीट सकते हैं। उसके विरूद्ध समाचार-पत्रों में प्रचार कर सकते हैं । आप तो ऐसे बात कर रहे हैं, जैसे आपका पैसा तो वहाँ लगा ही नहीं है हम उसे इतनी आसानी से नहीं छोडेंग़े।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कैसी बच्चों जैसी बातें करते हैं आप लोग! कोर्ट में जाने का मतलब है सालों तक मामला लटका रहेगा, फिर कोर्ट के जरिये तो आपको केवल व्हाइट पैसा ही मिलेगा। बाकी चालीस हजार कैश का क्या होगा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो हम क्या करें ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरी बात मानिए, झगडे से कुछ नहीं बनेगा । बिल्डर के साथ लडाई लड़ना असान नहीं है । आप अपने पैसे वापस ले लीजिए। कहीं वो भी किसी लफडे में न फँस जाये।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैं यह पैसा लेकर बैठा हूँ छोटेलाल की प्रतीक्षा में। तीन वर्षों में यह पैसा कैसे-कैसे सपने दिखाता रहा। फ्लैटों के रेट इस बीच आसमान को छूने लगे हैं। रामप्रकाश एंड कंपनी ने हमारी बिल्डिंग तिगुने दामों पर बेच दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काणे साहब के घर एक नयी मोटरसाइकिल, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, म्यूजिक सिस्टम दिखायी देने लगे हैं और उनके पासपोर्ट पर अंकित है कि वह पिछले तीन सालों में दो बार न्यूयॉर्क का चक्कर लगा आये हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/125616184089130577-2623527919865740939?l=bikharemoti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bikharemoti.blogspot.com/feeds/2623527919865740939/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=125616184089130577&amp;postID=2623527919865740939' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/2623527919865740939'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/2623527919865740939'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bikharemoti.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='ईटों का जंगल - तेजेन्द्र शर्मा'/><author><name>साहित्य-शिल्पी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03337085754343699108</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BR8jbtvir7g/SMnNChdyKzI/AAAAAAAAALU/m4mx3lCCz5I/S220/logo.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-125616184089130577.post-5594974584700838780</id><published>2008-11-06T20:31:00.000+05:30</published><updated>2008-12-13T15:57:11.857+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजीव रंजन प्रसाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>ढीली गाँठ [कहानी] - राजीव रंजन प्रसाद</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; "&gt;&lt;div style="border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; padding-bottom: 3px; padding-left: 3px; width: auto; font: normal normal normal 100%/normal Georgia, serif; text-align: left; "&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:'Times New Roman';"&gt;&lt;div style="border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; padding-bottom: 3px; padding-left: 3px; width: auto; font: normal normal normal 100%/normal Georgia, serif; text-align: left; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span"   style="line-height: 16px; font-family:Verdana;font-size:13px;"&gt;&lt;div class="post-body" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_5861RUoRfDU/R9Jy3JQkVZI/AAAAAAAAAcg/I9coXhro5yg/s1600-h/baster-tribe.jpg" style="color: rgb(0, 102, 204); "&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5175325213505901970" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_5861RUoRfDU/R9Jy3JQkVZI/AAAAAAAAAcg/I9coXhro5yg/s400/baster-tribe.jpg" border="0" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; padding-top: 4px; padding-right: 4px; padding-bottom: 4px; padding-left: 4px; border-top-width: 1px; border-right-width: 1px; border-bottom-width: 1px; border-left-width: 1px; border-top-style: solid; border-right-style: solid; border-bottom-style: solid; border-left-style: solid; border-top-color: rgb(255, 255, 255); border-right-color: rgb(255, 255, 255); border-bottom-color: rgb(255, 255, 255); border-left-color: rgb(255, 255, 255); " /&gt;&lt;/a&gt;फूल फूल गये थे। जंगल के जंगली फूल। बोदी के जूडे में जैसे तैसे उलझे और उसकी चाल से फुदकते थे फूल। वसंत आ गया है। बोदी भी गदरा गयी है। फूलों के बोझ से झुकी डाल सा उसका यौवन..। सुकारू सच कहता है- 'महुवा का रस है बोदी '।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;“बोदी” सुकारू नें आवाज़ दी।&lt;br /&gt;”काय आय?” (क्या है?)&lt;br /&gt;”कहाँ जासीत?” (कहाँ जा रही हो?)&lt;br /&gt;”मोहा बिनुक” (महुवा बीनने)&lt;br /&gt;”मैं बले आयेंदे” (मैं भी आता हूँ)। सुकारू नें आँखों में शरारत भर कर कहा।&lt;br /&gt;”तुम एउन काय करू आस?” (तुम आ कर क्या करोगे?)&lt;br /&gt;”मैं बल तुचो संग गोठियाते गोठियाते मोहा बीनेंदे” (मैं भी तुम्हारे साथ बातें करते हुए महुवा बीनूंगा)&lt;br /&gt;”हत बईहा नहीं तो” (हट पागल)&lt;br /&gt;बोदी शरमाती, मुस्काती, इठलाती पगडंडियों के संग हो ली। बार- बार पीछे मुडती कि कहीं सुकारू देख तो नहीं रहा। उसे अपनी ओर देखता पा खुद में सिमट जाती।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;ज़िंदगी यहीं तो है। हवाओं की तरह निश्चिंत, फिज़ा की तरह विस्तृत...और बोदी की तरह चंचल। असभ्यता का आँचल ओढा बस्तर अंचल कितना सभ्य है यह बताता है इस मिट्टी का आदम और उसकी अपार सादगी। प्रकृति नें इनके लिये कोई कसर नहीं छोडी। कोदो, कुटकी, कोसरा, हिरवाँ सब कुछ तो है, उसपर सुहागा यह कि इनके तीरों का जवाब न किसी परिंदे के पास है, न किसी चौपाए के पास।....। इसको बाहर की दुनियाँ से इस लिये लगाव है कि वह भीतर की परिधि में आश्चर्यजनक मनोरंजन भर सकें। उनके गाँवों के आसपास कुछ नगर उग आये हैं जो उनके पहाडों को फोड़ कर लोहा, टीन और कोरंडम निकाल रहे हैं। खैर, उन्हें क्या? रमता जोगी बहता पानी। यह बाहर की चकाचौँध है जो इन्हें अपनी ओर खींचती है। रुपयों से नया परिचय है उनका। बाजार में चमकते नये सपने उनकी आँखों में बुनने लगे हैं। खदानों नें इन्हें आकर्षित भी किया है। इतने सस्ते और मेहनती मजदूर मिलते भी कहाँ? रुपया इनके लिये सेतु बना है जुड़ने का, असभ्य-बर्बर उस सभ्यता से जो उन्ही के घर, उन्ही के जंगलों, उन्ही के पहाडों को तरक्की के झांसे में झोंक रहे हैं वह भी उनके अपने ही हाथों। हाँ, इसके एवज में उन्हे हासिल हैं कुछ रूपए। ये रूपया इन्हें क्यों चाहिये?.. बुदरू को इस लिये चाहिये कि वह रेडियो खरीदेगा, सोमारू साइकिल। सुकारू को तो बोदी के लिये जाने क्या क्या खरीदना है...भूख इनकी समस्या नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;*****&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;सुकारू बचेली जा रहा है। लोहे का पहाड खोदने वालों का बसाया नगर है यह। वहाँ उसे पत्थर तोडने का काम मिला है। बहुत खुश है, कि खरीदेगा रंग- रंग की चूडियाँ, झुमके और हार..कितनी खुश हो जायेगी बोदी और.....और आगे उसके अपने ही सुनहले सपने हैं। बोदी से बिहाव के सपने। पगडंडियों में धीरे- धीरे चलता वह, जाने किस दुनियाँ में था। कुहू..कुहू...कोयल चहकी और जैसे मंत्र मुग्ध सा सुकारू, चैतन्य हुआ। जंगल के बीच से पक्की सडक जाती थी। वह सडक पर चलने लगा। उसके नंगे पाँव जलने तो लगे थे, किंतु चल वह ऐसे रहा था मानों तपिश का अहसास नहीं। ठेकेदार नें दूर से उसे आते देखा। और भी मज़दूर वहाँ थे। सुकारू भी अब मज़दूर हो जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;“इधर आ बे” मुंशी का रूखा स्वर था यह।&lt;br /&gt;सुकारू सिमटता पास चला आया।&lt;br /&gt;“नाम क्या है तेरा”&lt;br /&gt;”सुकारू”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;मुंशी नें और कुछ नहीं पूछा। सुकारू अपने साथियों के पास जा कर खडा हो गया। उसने काम समझा, फिर उसके हाँथों में हथौडा आ गया। ठक...ठक...धडाक..उसके हाँथ पत्थरों पर कस कर प्रहार करने लगे। चट्टानों को पत्थर और पत्थरों को निश्चित आकार की गिट्टी करना उसका काम था। टुकडे टुकटे इन गिट्टियों को रेजाए बीनतीं, तगाड़ी में बटोर कर एक जगह ढेर करती जाती। उसमें जोश अधिक था, पत्थरों पर किये जा रहे अपने हर प्रहार में जैसे जान झोंक दी थी। सुकारू को परवाह श्रम की नहीं थी, उसे तो अपने सपनों की परवाह है। पसीने- पसीने हो गया वह, थकने भी लगा है। थक कर बैठता नहीं। वह देख रहा है कि उसके साथी जैसे अपने- अपने सपनों के लिये जुटे हैं। वह फिर चलाता है हथौडा और धडाक...पत्थर उसकी हिम्मत सा बिखर जाता है। आज उसका पहला दिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“एक बज गये हैं” मुंशी नें चिल्ला कर कहा “अभी छुट्टी, सब डेढ़ बजे आना”। सुकारू की जान में जान आयी। हथौडा पत्थरों के ढेर में ही पटक, वह वहीं पसर गया। भूख उसे लग आयी थी। क्या खाता? दूसरे साथी तो कुछ न कुछ पोटली में बाँध लाये थे किंतु सुकारू...&lt;br /&gt;“सुकारू...” किसी नें पीछे से आवाज़ दी। सुकारू मुडा।&lt;br /&gt;”मैं मँगती” रेजा नें अपना परिचय दिया। सुकारू नें नि:शब्द प्रश्न सूचक आँखें मंगती पर डाली।&lt;br /&gt;”खाना नहीं लाया?”&lt;br /&gt;सुकारू का मौन जैसे उत्तर था।&lt;br /&gt;”आ साथ में खायेंगे”।&lt;br /&gt;प्रतिवाद करने का साहस सुकारू में न था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेढ़ बजने में कुछ समय रहा होगा। मुंशी की मोटर सायकल साईट पर आ कर रुकी। मजदूर आराम कर रहे थे। मुंशी वहीं से चिल्लाया “ सालों, हराम की रोटी तोडते हो..डेढ बज गये..”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;सुकारू हराम की रोटी का मतलब नहीं समझता। शायद उसके वे साथी समझते थे जिन्होने मुंशी की इस बात पर ऐसा मुँह बनाया जैसे कच्ची इमली बिना नोन, खा ली हो। उसने तो औरों की तरह हथौडा उठाया और झोंक दिया खुद को। साढे पाँच बजे पसीना पोंछते हुए सुकारू नें हथौडा मुंशी के सामने पटका और वहीं खडा हो गया। मुंशी हिसाब कर रहा था। उसने नाम पुकारा “सुकारू”। सुकारू यंत्रवत पास आया। मुंशी नें जाने क्या जोडा, क्या घटाया। सुकारू के हाँथ में उसने आठ रुपये दिये और.....&lt;br /&gt;अब सुकारू के हाँथ में उसके सपने थे। उसके पैरों में पंख। वह बाज़ार की ओर जैसे दौड पडा। चम -चम करता बाज़ार और उसकी मुट्टी में बंद आठ रुपयों नें उसके लहू को नदी बना दिया था। इस दुकान से उस दुकान, घंटो जैसे फुदकता रहा वह। उसने लाल लाल काँच की चूडियाँ खरीदी, आँठ आने की माला, एक कंघी और.....&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;**********&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ए बोदी, ए बाट देख तो” (ए बोदी, इधर देखो तो)&lt;br /&gt;“काय आय” (क्या है)&lt;br /&gt;”देख मैं तुचो काजे काय काय आनले से” (देख मैं तेरे लिये क्या क्या लाया हूँ)। बोदी की लाज से दोहरी हुई आँखों नें सुकारू को साहस दे दिया था। उसने बोदी का हाँथ पकड लिया। बोदी नें बहुत नाजुक सा प्रतिवाद किया, जिसमे एक गहरा समर्पण ही परिलक्षित होता था। सुकारू नें बोदी के हाँथों में चूडियाँ डाल दीं। बोदी लजा कर पीछे मुड गयी। सुकारू नें बोदी का कंधा थाम अपनी ओर खींचना चाहा। बोदी खुद में सिमटती हुई बोली “मोचो काजे जे सब काय काजे आनलीसीत तेबे?” ( मेरे लिये यह सब तुम किस लिये लाये हो?)। सुकारू कुछ क्षण तो मौन रहा, फिर घबराहट और लज्जा के भाव चेहरे पर लिये उसने हिम्मत की “तुमी मोचो संग बिहाव करसे?” ( तुम मेरे साथ शादी करोगी?”)। एकाएक जैसे बहुत से रस भरे महुवे टप-टप बरस पडे। हवा खिलखिला उठी और फूल नाचने लगे। बोदी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। तिरछी आँखों से उसने जाने क्या कहा...और सुकारू, उसे तो जैसे सारी खुशियाँ मिल गयीं। भावावेश में उसने बोदी को अपनी ओर खींचा और नौरंगी माला उसके गले में डाल दी। बोदी किसी तरह खुद को छुडा कर हिरणी हो गयी। सुकारू के सपनों को धरातल मिल गया था। उसके चेहरे पर संतोष, आँखों में चमक और दिल में अनजानी गुदगुदी हो रही थी। सुकारू का प्रफुल्लित हृदय झूमती हवा के साथ गा उठा “ तुचो माया चो मोहरी बजायेंदे कसन, तुचो पिरीत चो रागीन गायेंदे कसन”&lt;br /&gt;पैसा सुकारू के लिये अब महत्वपूर्ण हो गया है। पैसा जिसने उसकी भावना को अभिव्यक्ति दी। अपने काम को ले कर वह दुगुना उत्साहित हो गया। उसका श्रम उसे पैसा देगा। पैसा खुशियों को पैदा करेगा। वह घर बनायेगा। घर में वह और वो...फिर..वह बोदी को नयी साडी खरीद कर देगा। सपने हसीनतर होते जा रहे थे और इसी उधेडबुन में सुकारू के कदम नाले से लगे तेंदु के पेड की ओर अनायास बढ गये। वह जानता था कि बोदी वहाँ होगी। बोदी वहाँ थी भी। आँचल में तेंदू बीनती जाने क्या गुनगुना रही थी, सुकारू की आहट से चुप हो गयी। चुराती हुई निगाहों से उसने सुकारू की ओर देखा, सुकारू मुस्कुरा दिया। बोदी नें मुस्कुराहट छुपा लेने की चेष्टा की किंतु उसके लाल हो चुके गालो में उसके मनोभावनाओं की अनेको तितलियों को उडते देखा जा सकता था।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;”सुकारू, तेंदू खासे?” (सुकारू तेंदु खायेगा?) बोदी नें निमंत्रण दिया।&lt;br /&gt;”तुय तुचो हाँथ में खवासे तो खायेंदे” (तू अपने हाँथों से खिलायेगी तो खाउंगा) सुकारू मुस्कुराया।&lt;br /&gt;प्रेम जीवन की एक आवश्यक भावना है जिसकी नियति आकर्षण है और अंत समर्पण। सुकारु अब पूंजीपति है। वह बोदी के रंग बिरंगे सपनों को सच कर सकता है किंतु क्या बोदी को कुछ नही करना चाहिये। बोदी के मन में भी तो वैसी ही भावनायें थीं जो सुकारू एक हृदय में पोषित होती हैं। बोदी सुकारू को लाल रंग का सुन्दर गमछा देना चाहती है। सुकारू की बनियान में कितने छेद हो गये हैं और रंग भी भूरा.. वह झक्क सफेद बनियान खरीद कर देगी। लेकिन कैसे? बोदी नें इन्ही भावनाओं में बह कर सुकारू से कहा “सुकारू, मैं बल तुचो संग काम करुक आयेंदे” (मैं भी तुम्हारे साथ काम करने आउंगी)। सुनते ही जैसे सुकारू के मन की उडती चिडिया पास की ही डाल पर बैठ गयी।&lt;br /&gt;”रेजा काम तुय करुक नी सकसे बही, हुता बडे बडे पखना मन के उठाउक पडेसे” (रेजा का काम तुम नहीं कर सकोगी। वहाँ बड़े बड़े पत्थरों को उठाना पडता है) सुकारू नें टालना चाहा। उसनें यह तो नहीं चाहा था।&lt;br /&gt;”तुय बल तो पखना फोडसीत काय?” (तुम भी तो पत्थर तोडते हो?)&lt;br /&gt;बोदी के स्वर में ज़िद थी।&lt;br /&gt;”मोचो गोठ अलग आय” (मेरी बात अलग है)&lt;br /&gt;”ये सुकारू, हम दुनों झने संगे कमाउक जावा” (ए सुकारू, हम दोनो लोग साथ में कमाने जायेंगे) बोदी नें मक्खन लगाना चाहा। सुकारू किंकर्तव्यविमूढ हो गया था। वह जानता था कि किस परिश्रम से उसने सपनों को जीवन दिया है। वह बोदी के हाँथों मे छाले नहीं देखना चाहता था। लेकिन बोदी के चेहरे के भावों में एक पक्कापन था। सुकारू जानता था कि बोदी नें इरादा कर लिया है।&lt;br /&gt;“ठीक आय! तुय बलसीत उसन जाले काले संगे जावाँ। मैं तुके ठेकेदार जागा धरुन नयंदे” (ठीक है कल तुम भी वहाँ मेरे साथ ही चलना, मैं ठेकेदार से मिलवा दूंगा), सुकारू विवश हो गया। वह आग में ठंडा पानी भला कैसे डालता। बोदी खुश हो गयी और आपने हाँथों से उसे तेंदू खिलाने लगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;**********&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;”तेरा नाम क्या है?” मुंशी नें बेहद मीठे स्वर में प्रश्न किया।&lt;br /&gt;”बोदी” संक्षिप्त उत्तर।&lt;br /&gt;मुंशी नें रजिस्टर में क्या लिखा यह बोदी नहीं जानती, हाँ मुंशी के व्यवहार से वह खुश थी। सुकारू को मुंशी का यह मीठा स्वर खटक गया। मन में हुई इस चुभन का कारण वह नहीं जानता किंतु उसका चेहरा जैसे उतर गया था। सुकारू इस तरह पलट कर अपने काम में जुट गया कि कोई उसके मन की पढ न ले। मुंशी नें बोदी के साथ बेहद सहृदयता दर्शायी थी, हल्का-फुल्का काम दिया और...और रह रह कर उसे देख अपने पीले दाँतों की प्रदर्शनी लगाता रहा था। और सुकारू गुस्से को पीने की कोशिश करता हथौडा हर बार पत्थर पर पूरी तकत से मारता और.. धडाक।&lt;br /&gt;बोदी। उसपर मुंशी की मेहरबानियाँ बढती गयी। मुंशी अब दिन भर साईट पर बैठा रहता और बोदी को अटपटे इशारे किया करता। ये इशारे सुकारू को समझ में तो न आते किंतु बोदी के मनोभाव वह जरूर पढ सकता था। शोषण शब्द से उसका परिचय तो नहीं था किंतु उसकी भावनाओं के इस शोषण नें उसके मन-वदन में आग लगा दी थी। सुकारू की विवशता यह थी कि अपना गुस्सा वह केवल उन बेजान पत्थरों पर ही निकाल पाता, टूट जाना ही जिनकी नियति है। टूटने लगा था सुकारू भी। क्या कहता वह बोदी को? कैसे समझाता। उसके प्रति बोदी का व्यवहार नहीं बदला था। अब भी बोदी तेंदू बीनती तो सुकारू के साथ ही बाँटती। जूडे में फूल सुकारू से ही लगवाती। कल सुकारू के लिये लाल चींटे की चटनी बनांने की जिद में वह सारी शाम जुटी रही और जाने क्या सोचती काम करती रही थी कि चींटियों नें पिसने से पहले बोदी के हाँथों को जगह जगह लाल कर दिया था। सुकारू के लिये उसने जो बनियान खरीदा था वह सुकारू नें खजाने की तरह सहेज रखा था कि केवल तिहार में ही पहनेगा और....उसे पहना-पहना कर देखने की जिद में दोनों का घंटो अनबोला रहता। सब कुछ तो ठीक है दोनों के बीच फिर सुकारू को एसा क्यों लगता है? सुकारू खुद नहीं जानता। उसे शक है....बोदी पर नहीं।&lt;br /&gt;एक बज गया था, बोदी नें तुम्बे से पेज, दो दोनों में निकाला, एक सुकारू के हाँथ में दिया और दूसरा दोना खुद उठा कर गट गट पी गयी। अब तक सुकारू भी पी चुका था। बोदी नें दोनो दोनों को फिर भरा...तभी मोटरसायकल की आवाज़ सुन कर बोदी पलटी। यह मुंशी था। बोदी मुस्कुरा दी। सुकारू के अंदर एक गहरी टीस उठी, किंतु वह खामोश रहा। मुंशी नें इशारे से बोदी को बुलाया और वह इतराती पास चली आयी। मुंशी के लिये आँखों में नफरत भर कर सुकारू सिर्फ इतना ही देख सका कि बोदी मुंशी के साथ...क्रोध में भर कर सुकारू नें तूम्बे को उठा कर पटक दिया। लाल आँखों को, जाती मोटरसायकल की धूल तिलमिलाने लगी थी।...। शाम को बोदी बहुत खुश थी। मोटरसायकल की सैर उसके लिये अनूठा अनुभव था। वह रह रह कर सुकारू को मोटरसायकल, उसकी आवाज़, उसकी रफ्तार...और भी जाने क्या क्या बताती रही। सुकारू अनमना ही बना रहा। सुकारू के साथ चलते हुए भी बोदी सुकारू के साथ नहीं थी। सुकारू जानता था कि वह मोटरसायकल तो कभी नहीं खरीद सकता लेकिन सायकल तो खरीद ही सकता है? सुकारू नें यह नया सपना अपनी फेरहिस्त में जोड लिया। ठीक भी तो है, सायकल की डंडी पर बोदी को बिठा कर जब वह घुमायेगा....उसके चेदरे में चमक उभरी तो थी किंतु फिर बोदी को देख उदासी की नयी परत नें उसे सहारा दिया। बोदी अब भी मोटरसायकिल की उसी कहानी में थी जिसका एक शब्द भी सुकारू नें नहीं सुना था। उसकी आँखों में एक नयी चमक देख कर सुकारू नें पूछना चाहा तो था कि क्या बोदी अब उसे प्यार नहीं करती। कैसे पूछता? सुकारू चुप ही रहा।&lt;br /&gt;**********&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0.75em; margin-left: 0px; line-height: 1.3em; "&gt;&lt;br /&gt;मुंशी आज सुबह से गायब था..और बोदी भी। शाम हो गयी थी, फिर शाम लम्बी होने लगी। अब साईट पर भी कोई नहीं था। सुकारू बोदी को चीख चीख कर आवाज़ देने लगा। आवाज़ उन्हीं पत्थरों में टकरा कर लौट आती, जिन पत्थरों के वह टुकटे टुकडे करता रहा है। वह हाँफने लगा था।..बोदी चली तो नहीं गयी? वह निश्चिंत हो जाना चाहता था, किंतु एक अज्ञात आशंका से उसका दिल धडक रहा था। एकाएक मंगती दौडती हुई आयी और जो कुछ उसने कहा वह उसके कलेजे पर पत्थर के गिरने जैसा ही था। दौड पडा वह मंगती के साथ ही। मंगती नें ग्रेनाईट के बडे से सफेद पहाड के एक ओर इशारा किया और सुकारू की आँखें उस विंदु पर स्थिर हो गयीं। बोदी.......। बदहवास वह उस तक पहुँचा। बिखरे हुए बाल..फटे हुए वस्त्र...देख कर ही समझा जा सकता था कि कई भेडियों नें मिल कर नोचा है।..बोदी..बोदी..सुकारू नें उसे पकड कर जोर से हिलाया। बोदी की आँखें खुली ही रहीं...।&lt;br /&gt;सुकारू की आँखें दहकने लगी थीं उसने झुक कर एक पत्थर उठाया और दौड पडा किसी दिशा में...एक आँधी उसके जीवन में, एक आँधी उसके मन में और एक आँधी उसके कदमों को खींचे जाती थी। ठोकर लगी और वह गिर पडा। पहाड का सीना चाह कर भी मोम न हो सका। सुकारू चीखा नहीं लेकिन एक छटपटाती हुई विवशता उसकी डूबती आँखों से झाँक रही थीं। सिर फट गया था..बुझती हुई चेतना में उसके हाँथ का वह पत्थर छूट गया जिसे अब तक कस कर पकडे हुए था सुकारू। अब शाम नें परछाईया बनानी भी बंद कर दी थी। धूल के साथ उस हवा नें सुकारू के बेतरतीब हो गये गमछे की ढीली गाँठ सुलझा दी थी। एक मुडा-तुडा नोट था जो उडा नहीं....&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/125616184089130577-5594974584700838780?l=bikharemoti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bikharemoti.blogspot.com/feeds/5594974584700838780/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=125616184089130577&amp;postID=5594974584700838780' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/5594974584700838780'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/125616184089130577/posts/default/5594974584700838780'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bikharemoti.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='ढीली गाँठ [कहानी] - राजीव रंजन प्रसाद'/><author><name>साहित्य-शिल्पी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03337085754343699108</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_BR8jbtvir7g/SMnNChdyKzI/AAAAAAAAALU/m4mx3lCCz5I/S220/logo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_5861RUoRfDU/R9Jy3JQkVZI/AAAAAAAAAcg/I9coXhro5yg/s72-c/baster-tribe.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
