छाँव भी लगती नहीं अब छाँव [कविता] - लाला जगदलपुरी

हट गये पगडंडियों से पाँव / लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। / चेतना को गति मिली स्वच्छन्द, / हादसे, देने लगे आनंद / खिल रहे सौन्दर्य बोधी फूल / किंतु वे ढोते नहीं मकरंद। / एकजुटता के प्रदर्शन में / प्रतिष्ठित हर ओर शकुनी-दाँव। / हट गये पगडंडियों से पाँव / लो, सड़क पर आ गया हर गाँव। / आधुनिकता के भुजंग तमाम / बमीठों में कर रहे आराम / शोहदों से लग रहे व्यवहार / रुष्ट प्रकृति दे रही अंजाम। / दुखद कुछ ऐसा रहा बदलाव / छाँव भी लगती नहीं अब छाँव। आगे पढ़ें... →

कवि डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जी के सान्निध्य में - डा॰ महेन्द्रभटनागर

ग्वालियर-उज्जैन-इंदौर नगरों में या इनके आसपास के स्थानों (देवास, धार, महू, मंदसौर) में वर्षों निवास किया; एतदर्थ ‘सुमन’ जी से निकटता बनी रही। ख़ूब मिलना-जुलना होता था; घरेलू परिवेश में अधिक। जा़हिर है, परस्पर पत्राचार की ज़रूरत नहीं पड़ी। पत्राचार हुआ; लेकिन कम। ‘सुमन’ जी के बड़े भाई श्री हरदत्त सिंह (ग्वालियर) और मेरे पिता जी मित्र थे। हरदत्त सिंह जी बड़े आदमी थे; हमारे घर शायद ही कभी आये हों। पर, मेरे पिता जी उनसे मिलने प्रायः जाते थे। वहाँ ‘सुमन’ जी पढ़ते-लिखते पिता जी को अक़्सर मिल जाया करते थे। ‘सुमन’ जी बड़े आदर-भाव से पिता जी के चरण-स्पर्श करते थे। लेकिन, ‘सुमन’ जी में सामन्ती विचार-धारा कभी नहीं रही। आगे पढ़ें... →

भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति [आलेख] - डॉ. काजल बाजपेयी

संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है। संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। मैं बचपन से दो प्रकार की संस्कृतियों के बारे में सुनती आ रही हूँ। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति या अंग्रेजी संस्कृति।  आगे पढ़ें... →

प्रसिद्व कथाकार तेजेन्द्रर शर्मा से बातचीत [साक्षात्कार] - मधु अरोड़ा

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लेखन आपके लिये क्या है?

तेजेन्द्र शर्मा - लेखन मेरे लिए आवश्यकता भी है और मजबूरी भी। जब कभी ऐसा कुछ घटित होते देखता हूं जो मेरे मन को आंदोलित करता है तो मेरी कलम स्वयंमेव चलने लगती है। मेरे लिए लिखना कोई अय्याशी नहीं है, इसीलिए मैं लेखन केवल लेखन के लिए जैसी धारणा में विश्वास नहीं रखता। लिखने के पीछे कोई ठोस कारण और उद्देश्य होना आवश्यक है। न ही मैं स्वांखत: सुखाय लेखन की बात समझ पाता हूं। मैं अपने प्रत्येक लिखे हुए शब्द के माध्यम से अपनी बात आम पाठक तक पहुंचाना चाहता हूं। हां यह सच है कि मैं हिन्दी के मठाधीशों को प्रसन्न करने के लिए भी नहीं लिखता। मुझे एक अनजान पाठक का पत्र किसी बड़े आलोचक की शाबाशी के मुक़ाबले कहीं अधिक सुख देता है। लेकिन वहीं यह भी एक ठोस सच्चाई है कि जब कभी किसी स्थापित लेखक या आलोचक ने मेरी रचना को सराहा है, मन को अच्छा लगा है।

आपकी निगाह में लेखक एक आम आदमी से किस प्रकार भिन्न होता है?

तेजेन्द्र शर्मा - मुझे लगता है कि परिष्कृत सोच एवम् संवेदनशीलता एक लेखक को एक आम आदमी से अलग करती है। अब देखिये कनिष्क विमान की दुर्घटना एक आम आदमी को भी आंदोलित करती है और एक लेखक को भी। जहां आम आदमी समय के साथ साथ उस घटना को भुला देता है, वहीं एक संवेदनशील लेखक उस घटना को अपने दिमाग़ में मथने देता है। समय के साथ साथ वह घटना तो अवचेतन मन में चली जाती है, लेकिन एक रचना का जन्म हो जाता है। जहां आम आदमी अपने आप को केवल घटना तक सीमित रखता है, वहीं एक अच्छा लेखक उस घटना के पीछे की मारक स्थितियों की पड़ताल करता है और एक संवेदनशील रचना रचता है। मैं लेखन के लिये किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा का पक्षधर होना आवश्यक नहीं समझता।

आप अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान किस मानसिकता से गुज़रते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा - मेरे लिए रचना प्रक्रिया कोई नियमबद्ध कार्यक्रम नहीं है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। आसपास कुछ न कुछ घटित होता है जो कि मन को उद्वेलित करता है। दिल और दिमाग़ दोनों ही उस के बारे में जुगाली करते रहते हैं। और फिर एकाएक रचना पहले दिमाग़ में और फिर पन्नों पर जन्म लेती है। कहानी के मुक़ाबले मैं पाता हूं कि कविता के लिए उतना सोचना नहीं पड़ता। ग़ज़ल या कविता जैसे स्वयं उतरती चली आती है। यदि मैं चाहूं भी तो सायास ग़ज़ल या कविता नहीं लिख पाता जबकि कहानी के लिए रोज़ाना कुछ पन्ने काले किए जाते हैं चाहे उन्हें खारिज ही क्यों न करना पड़े। मेरे पहले ड्राफ़्ट में खासी काटा पीटी होती है क्योंकि मैं लिखते लिखते ही सुधार भी करता जाता हूं। कहानी लिखने की प्रक्रिया में कंसंट्रेशन अधिक समय तक बनाए रखना पड़ता है। मेरी एक कोशिश ज़रूर रहती है कि मैं अपने चरित्रों की मानसिकता, सामाजिक स्थिति एवं भाषा स्वयं अवश्य समझ लूं, तभी अपने पाठकों से अपने चरित्रों का परिचय करवाऊं।

अब तो आपको लंदन आए करीब दस वर्ष हो गये। क्या इससे आपके नज़रिए में परिवर्तन आया है? इससे पहले भी आप पूरी दुनिया घूम चुके हैं। आप इस सारे परिदृश्य में हिन्दी लेखन को कहां पाते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा - देखिये पहले मैं एक एअरलाईन के क्रू मेम्बर की हैसियत से विदेश जाया करता था। विदेश के जीवन को एक तयशुदा दूरी से देखता था, उसे उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाता था जितना कि आज। मेरा आज का संघर्ष मुझे अप्रवासी भारतीय की सभी दिक्कतों और सुविधाओं से परिचय करवाता है। मुझे लगता है कि भारत के बाहर यदि कहीं हिन्दी साहित्य की रचना बड़े पैमाने पर हो रही है तो वो है युनाइटेड किंगडम। यहां बहुत से स्तरीय कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और ग़ज़लकार सक्रिय हैं।

लंदन में बसने के पश्चात आपके लेखन में सकारात्मक या नकारात्मक, किस प्रकार का प्रभाव पड़ा है?

तेजेन्द्र शर्मा -मधु जी, पहले नकारात्मक । लंदन आने के पश्चात पहले तो वही नॉस्टेलजिया वाली बात कि बात बात पर भारत को मिस करना और याद करके परेशान होना। मैं जब जब कलम उठाऊं तो भारत को ले कर ही कुछ न कुछ काग़ज़ पर उतरना शुरू कर दे। मैने बहुत से पन्ने लिखे और फाड़ दिये। मुझे विदेश में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य से यह शिकायत है कि दो एक रचनाकारों को छोड़ कर वहां का हिन्दी लेखक नॉस्टेलजिया से बाहर नहीं आ पाता। वह अपने आप को अपने स्थानीय समाज के साथ जोड़ नहीं पाता और इसलिए ऐसे समाज के बारे में लिखता है जिसे वह पीछे छोड़ आया है। मज़ेदार बात यह है कि जिस समाज को वह पीछे छोड़ आया है, वह भी बदल जाता है। अंतत: वह किसी ऐसे समाज के बारे में लिखने लगता है जो वास्तविक है ही नहीं। वह समाज केवल उसके दिल-ओ-दिमाग़ में रहता है। सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि मैंने इंगलैण्ड के समाज को समझने का प्रयास किया, वहां के गोरे आदमी की मानसिकता को जानने की कोशिश की और एक मुहिम चलाई की हिन्दी लेखक विदेश में किए गये अपने संघर्ष या अपने आसपास के जीवन को समझने का प्रयास करें और उसे ही अपने लेखन का विषय बनाए। क़ब्र का मुनाफ़ा, तरक़ीब, कोख का किराया, मुझे मार डाल बेटा, ये क्या हो गया, गंदगी का बक्सा, बेघर आंखें मेरे इन्हीं प्रयासों का फल हैं। हां वहीं यह भी सच है कि इंदु शर्मा कथा सम्मान के अंतर्राष्ट्रीय हो जाने और कथा (यू.के.), द्वारा लगातार कथा गोष्ठियों के आयोजन से मेरे लेखन की निरंतरता में कमी आई है।

साहित्य में अश्लीलता के प्रश्न पर आप क्या कहना चाहेंगे?

तेजेन्द्र शर्मा -आज के संदर्भ में यह प्रश्न थोड़ा आप्रसांगिक हो गया है। कोई भी चीज़ अपने संदर्भों के तहत ही अश्लील हो सकती है। जैसे भारत को स्वतंत्रता मिलने से पहले भारतीय सिनेमा का सबसे लम्बा चुम्बन पर्दे पर कलाकार हरि शिवदासानी (करिश्मा एवं करीना कपूर के नाना) ने लिया था, और वह अश्लील नहीं माना गया। फिर एक ऐसा समय आया कि हीरो हीरोईन कूल्हे मटका मटका कर अश्लील इशारे करते थे किन्तु उनको अश्लील नहीं माना जाता था, जबकि चुम्बन को अश्लील माना जाने लगा। यही हाल डी.एच. लॉरेंस के उपन्यास लेडी चैटरलीज़ लवर के बारे में कही जा सकती है कि जब उसका प्रकाशन हुआ था, उसे अश्लील मान कर उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जबकि आज यही उपन्यास आसानी से हर जगह उपलब्ध है। मृदुला गर्ग के बोल्ड दृश्यों और भाषा पर भी आज कोई बात नहीं करता। यानि कि अश्लीलता के संदर्भ समय और काल के साथ साथ बदलते रहते हैं।

आप यू.के. हिन्दी लेखन के विषय में कुछ बताएं।

रचनाकार परिचय:-

मधु अरोड़ा का जन्म जनवरी, १९५८ को हुआ। आप वर्तमान में भारत सरकार के एक संस्थान में कार्यरत हैं आपने अनेक सामाजिक विषयों पर लेखन, भारतीय लेखकों के साक्षात्कार तथा स्वतंत्र लेखन किया है। आपकी आकाशवाणी से कई पुस्तक-समीक्षायें प्रसारित हुई हैं। आपका मंचन से भी जुड़ाव रहा है।
तेजेन्द्र शर्मा - मैं जब भारत में रहता था तो मैंने यू.के. के केवल एक ही साहित्यकार के बारे में सुन रखा था या उनकी कविता पढ़ रखी थी। वे साहित्यकार हैं डा. सत्येन्द श्रीवास्तव - जिन्हें कथा यू.के. द्वारा प्रथम पद्मानंद साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। यहां आकर मैंने पाया कि कविता विधा को ले कर यहां बहुत से साहित्यकार सक्रिय हैं। वहीं कहानी क्षेत्र में एक वैक्यूम सा दिखाई दे रहा था। इस वैक्यूम को भरने की शुरूआत कथा यू.के. ने कथा गोष्ठियां आयोजित करके यूनाइटेड किन्गडम में हिन्दी कहानी लेखन का माहौल पैदा करने का प्रयास किया। कथा यू.के. ने सूरज प्रकाश के संपादन में कथा - लंदन जैसा कहानी संग्रह प्रकाशित करवाया जिसमें वे कहानियां शामिल हैं जिन्हें कथागोष्ठियों में पढ़ा गया । इस संग्रह की एक विशेषता यह भी है कि इसमें उन कथागोष्ठियों की रिपोर्टें भी शामिल थीं जिनमें इन कहानियों को पढ़ा गया था। इस तरह हमने केवल लेखक ही नहीं पाठकों और श्रोताओं का स्तर भी विश्व तक पहुंचाया । कथा यू.के. ने सूरज प्रकाश के ही संपादन में एक कहानी संग्रह प्रकाशित करवाया है कथा दशक जिसमें दस इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित कथाकारों की रचनाएं हैं।

इंदु शर्मा कथा सम्मान अब अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर चुका है, इसकी भावी योजनाएं क्या हैं?

तेजेन्द्र शर्मा - देखिये अभी तक इंदु शर्मा कथा सम्मान के साथ केवल सम्मान ही जुड़ा है। हमारी योजना है कि इस सम्मान के साथ साथ इसे पुरस्कार भी बनाया जाए और इसके साथ एक सम्मानजनक राशि भी जोड़ी जाए। लेकिन एक बात साफ़ करना चाहूंगा कि यह सम्मान एक लेखक द्वारा एक लेखिका की याद में लेखकों को दिया जाता है। और इस सम्मान के आयोजन में भी एक लेखक (सूरज प्रकाश) ही जुड़ा है। तो यह एक लेखकीय मामला है जिसके साथ भावनाएं जुड़ी हैं,कोई अमीर ट्रस्ट या धन्ना सेठ नहीं जुड़ा है। इस पुरस्कार के साथ हमारे पूरे परिवार जुड़े हैं।

भारत में यह सम्मान 40 वर्ष से कम उम्र के कथाकारों को दिया जाता था। किन्तु लंदन में उम्र और विधा की सीमा हटा दी गई है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे संभावनाशील कथाकारों का हक़ मारा गया है।

तेजेन्द्र शर्मा -मधु जी, जब किसी भी वस्तु का आकार बदलता है तो टुकड़ों में ही बदले ऐसा आवश्यक नहीं है। भारत में इंदु शर्मा कथा सम्मान का अपना एक स्वरूप था लेकिन जब उसे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने की बात हुई तो बहुत से पहलुओं पर विचार करना पड़ा। कथा तो कहानी भी है और उपन्यास भी। यानि कि कहानी के साथ उपन्यास को भी जोड़ दिया गया। आज का संभावनाशील लेखक ही कल का प्रतिष्ठत लेखक बन जाता है। यानि कि अब इस सम्मान के साथ आरक्षण नीति को समाप्त कर के इसे खुले बाज़ार में खड़ा कर दिया है। जो भी पुस्तक सर्वश्रेष्ठ होगी स्वयं ही सम्मान की हकदार हो जाएगी। हम लेखक को पहले भी पुरस्कृत नहीं करते थे और आज भी नहीं करते। पहले भी कृति का सम्मान होता था और आज भी। चालीस वर्ष से कम उम्र के लेखक इस सम्मान के घेरे से बाहर नहीं कर दिये गए। वास्तव में एक युवा लेखक का उपन्यास काला पहाड़ अंतिम दो तक पहुंच गया था। अब इस सम्मान के साथ आयु सीमा जैसी कोई बात नहीं है। इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है, शर्त केवल एक ही है कि रचना उत्कृष्टं होनी चाहिये।

ख़ैर, आपकी कहानियों में मृत्यु, अकेलापन, डर, बुढ़ापा, बेमेल विवाह बार बार आते हैं। इसकी कोई ख़ास वजह?

तेजेन्द्र शर्मा - मधु जी कोई भी लेखक वही लिखता है जो देखता है या फिर भुगतता है। मैंने मौत को बहुत क़रीब से देखा है। पहले पिता जी की दिल की बीमारी से मृत्यु और फिर इंदु जी की कैंसर से मौत। इसके पहले भी विमान दुर्घटना में तीन सौ उनतीस यात्रियों की मृत्यु जैसे हादसे किसी भी लेखक को लिखने के लिए मजबूर कर देंगे। फ़्लाइट परसर होने के नाते मैने विदेश में बहुत से डरे हुए भारतीयों को देखा है। कुछ खोने का डर मैंने महसूसा है। अपने पिता की उनके बुढ़ापे में मदद ना कर पाने का अपराधबोध मुझे हमेशा सालता है। ज़ाहिर है कि यह सब थीम मेरी कहानियों में आ ही जाते हैं। वैसे मेरी कहानियों का एक महत्वपूर्ण थीम सम्बन्धों में आता खोखलापन और जीवन पर हावी होती भौतिकता भी है। मेरी पहले की कहानियां जैसे कि देह की कीमत, काला सागर, ढिबरी टाईट, कड़ियां, इत्यादि में आपको यह थीम दिखाई देंगी। मेरी आज की कहानियों में आपको इंगलैण्ड का भारतीय या गोरा समाज दिखाई देगा। जैसे पिछले तीन वर्षों से मेरा उठना बैठना लंदन के मुस्लिम समाज में खासा रहा क्यों कि मैं एक ऐसे बैंकर की आत्मकथा लिख रहा था जिसका जन्म कानपुर में हुआ, पढ़ाई कराची में और उसने लंदन में हबीब बैंक को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। शायद इसी कारण मेरी पिछली कुछ कहानियां जैसे कि एक बार फिर होली, क़ब्र का मुनाफ़ा, दीवार थी दीवार नहीं थी, तरकीब, और होम-लेस में मुस्लिम थीम उभर कर सामने आए हैं।

लेखन में जब आप ख़ुद को उलझा पाते हैं, तो क्या करते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा -ऐसा कई बार हो जाता है कि आपने रचना शुरू की और रास्ते में ही उलझ गये। कुछ एक रचनाएं मैंने तीन वर्ष पहले लिखनी शुरू की थीं, लेकिन वे पूरी नहीं हो पाईं हैं। यानि कि मिस-कैरिज जैसा कुछ हो गया। लेकिन ऐसा भी हुआ है कि कोई रचना छ: महीने के बाद उठाई और वहीं से दोबारा शुरू हो गये जहां कि छोड़ी थी। लेकिन मैं बीच बीच में ग़ज़ल या कविता भी लिखने का प्रयास कर लेता हूं। इस से थोड़ा चेन्ज मिल जाता है। वैसे संस्थागत कार्यों की वजह से भी लेखन कई बार हार जाता है। लेकिन लिखे बिना चैन भी तो नहीं मिलता है न।

जब आप नहीं लिख रहे होते हैं तो क्या कर रहे होते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा - नहा रहा होता हूं, भोजन खा रहा होता हूं, दफ़्तर में काम कर रहा होता हूं, । यानि कि रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त होता हूं। मधु जी, लेखक का लेखन केवल काग़ज़ पर ही नहीं होता। लेखक हर समय सामग्री जुटाता रहता है। उसका दिमाग़ कभी शांत हो कर आराम नहीं कर पाता। उसे आसपास के लोगों और घटनाओं से थीम, चरित्र और प्लॉट मिलते हैं। इसलिए लेखक हर वत्त कुछ न कुछ लिख रहा होता है। सच्चा लेखक कभी भी न लिखने के कारण नहीं खोजता। उसे लिखने की आग आराम ही नहीं करने देती।

आप समकालीन लेखन में अपने आप को कहां पाते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा -यह तो कोई आलोचक ही बता पाएगा। वैसे समकालीन लेखन में चर्चा उन्हीं लोगों की हो पाती है जो किसी गुट विशेष से जुड़े होते हैं। मुझे याद आता है कि एक कथागोष्ठी में मैंने अपनी कहानी देह की कीमत का पाठ किया था। मेरी यह कहानी जगदम्बा प्रसाद दीक्षित जी की प्रिय कहानियों में से है। उस गोष्ठी में साजिद रशीद साहब ने भी अपनी कहानी का पाठ किया था। भाई आत्माराम उस गोष्ठी में देर से आए इसलिए साजिद रशीद की कहानी सुन नहीं पाए। मेरी कहानी भी उन्होंने आधी ही सुनी। वे बोलने के लालच से बच नहीं पाए और खड़े हो कर बोले,"मैं साजिद रशीद की कहानी सुन नहीं पाया, लेकिन मैं जानता हूं कि उनकी कहानी अच्छी ही होगी क्योंकि उनके पास एक परिपक्व राजनीतिक दृष्टिकोण है। ऐसे में जब किसी पाठक का एक पत्र भी आ जाता है तो बहुत प्रस्न्नता होती है। मेरा काम केवल लिखना है। यदि मैंने अच्छा लिखा है तो मेरा लेखन स्वयं ही अपनी जगह बना लेगा।

आपको समकालीन लेखकों में कौन कौन से अच्छे लगते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा - दरअसल मुझे लेखकों से अधिक उनकी कृतियां प्रिय होती हैं। जैसे जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का मुर्दाघर, पानू खोलिया का सत्तर पार के शिखर, जगदीश चंद का कभी न छोड़ें खेत, श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी, हिमांशु जोशी का कगार की आग, ज्ञान चतुर्वेदी का बारामासी, चित्रा मुद्गल का आंवां, संजीव का जंगल जहां शुरू होता है, सूरज प्रकाश का देस बिराना, नरेन्द कोहली की दीक्षा, विभूति नारायण राय का तबादला मेरी प्रिय पुस्तकों में से हैं। इस का अर्थ यह नहीं कि बस यही हैं। और भी बहुत सी कहानियां और उपन्यास हैं जिन्हें मैं अपने बहुत करीब पाता हूं।

क्या आप अपने लेखन से संतुष्ट हैं?

तेजेन्द्र शर्मा -संतुष्ट होने का अर्थ होगा कि लिखना बंद। हां कोई भी रचना पूरी होने के बाद एक विचित्र सी संतुष्टि का आभास होता है। लेकिन तुरंत मन कहता है कसर रही कसर रही और अंदर का लेखक अगली चुनौती के लिए तैयार हो जाता है।

क्या आप अपने देश भारत को छोड़ने की कचोट महसूस करते हैं?

तेजेन्द्र शर्मा -देखिए मुंबई में जितने भी हिंदी के कवि हैं वे सब किसी अन्य शहर, गांव या कस्बे से आए हैं। उनके लेखन में उस स्थान की तड़प देखी और महसूस की जा सकती है। इसी को नॉस्टेलजिया कहा जाता है। मैं झूठ बोलूंगा यदि कहूं कि मैं मुंबई की यादों को लेकर परेशान नहीं होता। लेकिन जब दिल्ली छोड़ कर मुंबई आया था तो दिल्ली को लेकर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि रहने के लिए लंदन एक बेहतरीन जगह है। यहां टुच्चा भ्रष्टाचार कहीं नहीं है। मेरी सोच यह है कि मैं एक अच्छी जगह रह रहा हूं। जब कभी मेरे दिल में यादें एक तूफ़ान खड़ा कर देती हैं तो मैं टिकट कटवा कर भारत आ जाता हूं। आम इन्सान के लिये ब्रिटेन में ख़ास ख़्याल रखा जाता है।

साहित्य में जो मेन-स्ट्रीम को लेकर एक सोच बनी हुई है, उसके बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या यह सही मायने में मुख्यधारा है?

तेजेन्द्र शर्मा -मधु जी हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा वह है जिसमें लेखक और पाठक दोनों एक ही हैं। यदि आप मार्क्सवाद से प्रभावित हैं और आप के थीम मज़दूर, किसान, बाज़ारवाद, भ्रष्टाचार और सरकार विरोध हैं तो आप इस मुख्यधारा का हिस्सा हैं। अन्यथा आप कितना भी अच्छा लिखते हों, आप इस धारा में नहीं तैर सकते। इस मुख्यधारा का पाठकों के साथ कोई रिश्ता नहीं। यहां आप आलोचकों की वाहवाही के लिये लिखते हैं। मैं उस लेखन का पक्षधर हूं जो पाठक के साथ एक संवाद पैदा करे। साहित्य का पठनीय होना उसके महान होने की पहली शर्त है।

आजकल कथा यू.के. लंदन में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के साथ मिलकर हिन्दी-उर्दू के बीच की खाई पाटने हेतु प्रयासरत है। क्या आप सोचते हैं कि कभी ऐसा हो पाएगा?

तेजेन्द्र शर्मा -देखिये एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की मुखिया काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी जी ने कथा यू.के. के कार्यक्रमों में बहुत सक्रिय सहयोग दिया है। हमारे हिन्दी लेखकों हेतु लंदन के उर्दू लेखकों के साथ एक बातचीत का आयोजन ज़रूर करती हैं। हमारे हर काम को अपना काम मानती हैं। उन्होंने उर्दू से हिन्दी और हिन्दी से उर्दू में कहानियां अनुवादित करवाने का काम किया है। हिन्दी कहानियों की आडियो बुक्स भी बनवाई हैं। हमें लगता है कि यही काम तो कथा यू.के. का भी है। इसलिये एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के साथ मिलकर काम करना हमें अच्छा लगता है। हमारा काम है लगन, मेहनत और ईमानदारी से जुटे रहना, अब हम सफल हो पाते हैं या नहीं यह तो समय ही बताएगा।

आप पर बारबार आर.एस.एस. का पक्षधर होने का आरोप लगता रहा है। आप इस पर क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे?

तेजेन्द्र शर्मा -मधु जी मैं भारत के किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं हूं। भारत में समस्या यह है कि यदि आप मार्क्सवादी नहीं हैं तो यह मान लिया जाता है कि आप दक्षिणपंथी हैं। यह तो कोई सही तरीका न हुआ। साहित्य में बहुत सी ज़मीन और भी है। मैं विचारधारा के साहित्य को महत्वपूर्ण नहीं मानता। मेरा मानना है कि साहित्य के लिये विचार ज़रूरी है न कि विचारधारा। विचार मनुष्य के भीतर से जन्म लेता है जबकि विचारधारा ऊपर से थोपी जाती है। जब जब मुझ पर राजनीतिक आरोप लगाए जाते हैं, मैं मुस्कुरा भर देता हूं। मैं यह कह सकता हूं कि मेरी कहानियां एक ही रंग, देह की कीमत, काला सागर, तरकीब, मुझे मार डाल बेटा, कड़ियां, क़ब्र का मुनाफ़ा, पासपोर्ट का रंग या फिर कोई भी और कहानी पढ़ कर बताइये कि मेरी कौन सी कहानी आर.एस.एस. विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है। मेरी रचनाएं प्रमाण हैं इस बात का कि मैं केवल आम आदमी के बारे में सोचता हूं किसी राजनीतिक विचारधारा का ग़ुलाम नहीं हूं।

10 टिप्पणियाँ:

  1. अभिषेक सागर says

    बहुत अच्छा साक्षात्कार है। बधाई मधु जी।


    अनिल कुमार says

    भारत में समस्या यह है कि यदि आप मार्क्सवादी नहीं हैं तो यह मान लिया जाता है कि आप दक्षिणपंथी हैं। यह तो कोई सही तरीका न हुआ। साहित्य में बहुत सी ज़मीन और भी है। मैं विचारधारा के साहित्य को महत्वपूर्ण नहीं मानता। मेरा मानना है कि साहित्य के लिये विचार ज़रूरी है न कि विचारधारा। विचार मनुष्य के भीतर से जन्म लेता है जबकि विचारधारा ऊपर से थोपी जाती है।

    सहमत हूँ तेजेंद्र जी लेकिन मार्क्स के छ्द्म प्रचारक पहुँच ही रहे होंगे आपको गालियाँ देनें। सावधान रहें।


    निधि अग्रवाल says

    संस्मरन पढ कर तेजेन्द्र जी के बारे में और जानने की इच्छा बलवति हो उठी थी। "हिन्दी के मठाधीशों को प्रसन्न करने के लिए भी नहीं लिखता।" पढ कर उनके व्यक्तित्व और लेखन का परिचय भी मिला।


    मोहिन्दर कुमार says

    लेखन और अन्य पहलुओं पर तेजेन्द्र जी के विचारों से अवगत कराते इस साक्षात्कार के लिये मधु जी का आभार.

    मैं तेजेन्द्र जी से सहमत हूं कि किसी विशेष विचारधारा से अनुग्रह रखना अपनी रचना धर्मिता को बेडियों में बांधने के समान है.


    अनन्या says

    गंभीर और सार्थक साक्षात्कार है। सभी प्रश्न अच्छे हैं व उत्तर प्रभावी दिये गये हैं। अपनी रचनाधर्मिता और विचारधारा का अनुपालन लेखक का निजी होता है।


    दृष्टिकोण says

    अच्छा साक्षात्कार है।


    अजय यादव says

    तेजेन्द्र जी को जानने का एक अवसर उपलब्ध कराता एक उम्दा साक्षात्कार!
    मधु जी का हार्दिक आभार; इस प्रस्तुति के लिये!


    अतुल्य says

    बहुत ही अच्छा इंटरव्यू है! आभार स्वीकारे!


    nupur says

    very good Madhu jee.....
    Congratulations.


    राजीव रंजन प्रसाद says

    यह साक्षात्कार लेखक के जीवन के लगभग सभी पहलुओ को उजागरन करता है। यह मिथक भी प्रभावी तौर पर तोडा गया है कि विचारधारा से बंध कर ही कोई लेखक लेखक हो सकता है। मधु जी का आभार।


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